उल्लु का घरौंदा। (कथा शृंखला)
कथा शृंखला - “उल्लु का घरौंदा ।” (प्रस्तावना) य ह एक सर्वविदित सत्य है कि दया और कीर्ति दो सगी बहनों की तरह हैं; जहाँ दया का वास होता है, वहाँ कीर्ति स्वयं ही चली आती है। दयालु व्यक्ति का यश और सम्मान दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है। परन्तु यह कहानी उन अमूर्त भावनाओं की नहीं, बल्कि हाड़-मांस की बनी दो सगी बहनों, दया और कीर्ति की है, जिनके जीवन ने इस कहावत को एक विचित्र और त्रासद रूप में चरितार्थ किया है। दोनों का जन्म एक ही माँ की कोख से हुआ था, किन्तु उनके स्वभाव में धरती और आकाश का अंतर था। बड़ी बहन, दया, अपने नाम के अनुरूप ही शांत, सरल और सौम्य थी, जैसे किसी शांत सरोवर का ठहरा हुआ जल। वहीं छोटी बहन, कीर्ति, एक प्रचंड अग्नि की भाँति थी—गुस्सैल, ईर्ष्यालु और बात का बतंगड़ बनाने में माहिर। उसकी जीभ कैंची की तरह चलती थी और मन में ईर्ष्या का विष सदैव घुला रहता था। दोनों बहनें एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाती थीं। यूँ तो दया औरों के लिए करुणा की मूर्ति थी, पर अपनी ही छोटी बहन कीर्ति के लिए उसके मन में दया का भाव कभी अंकुरित ही नहीं हो पाया। लड़ते-झगड़ते और एक-दूसरे को नीचा दिखाते हुए दोनों ज...