उल्लु का घरौंदा। (कथा शृंखला)


कथा शृंखला- “उल्लु का घरौंदा।”


(प्रस्तावना)

ह एक सर्वविदित सत्य है कि दया और कीर्ति दो सगी बहनों की तरह हैं; जहाँ दया का वास होता है, वहाँ कीर्ति स्वयं ही चली आती है। दयालु व्यक्ति का यश और सम्मान दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है। परन्तु यह कहानी उन अमूर्त भावनाओं की नहीं, बल्कि हाड़-मांस की बनी दो सगी बहनों, दया और कीर्ति की है, जिनके जीवन ने इस कहावत को एक विचित्र और त्रासद रूप में चरितार्थ किया है।

दोनों का जन्म एक ही माँ की कोख से हुआ था, किन्तु उनके स्वभाव में धरती और आकाश का अंतर था। बड़ी बहन, दया, अपने नाम के अनुरूप ही शांत, सरल और सौम्य थी, जैसे किसी शांत सरोवर का ठहरा हुआ जल। वहीं छोटी बहन, कीर्ति, एक प्रचंड अग्नि की भाँति थी—गुस्सैल, ईर्ष्यालु और बात का बतंगड़ बनाने में माहिर। उसकी जीभ कैंची की तरह चलती थी और मन में ईर्ष्या का विष सदैव घुला रहता था। दोनों बहनें एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाती थीं। यूँ तो दया औरों के लिए करुणा की मूर्ति थी, पर अपनी ही छोटी बहन कीर्ति के लिए उसके मन में दया का भाव कभी अंकुरित ही नहीं हो पाया।

लड़ते-झगड़ते और एक-दूसरे को नीचा दिखाते हुए दोनों जवान हुईं। भाग्य का फेर देखिए कि दोनों का विवाह एक ही गाँव में दो सगे भाइयों से कर दिया गया। माता-पिता ने सोचा था कि एक ही घर-आँगन में रहने से शायद दोनों के बीच का बैर प्रेम में बदल जाएगा, पर वे यह नहीं जानते थे कि वे एक ही म्यान में दो तलवारें रखने की भूल कर रहे थे।

दया के पति, भंवर सिंह, एक सरकारी महकमे में बड़े प्रशासनिक पद पर आसीन थे—एक रौबदार और सम्मानित व्यक्ति। उनके छोटे भाई, मदन सिंह, गाँव में ही रहकर खेती-बाड़ी करते थे। उनका परिवार गाँव के सबसे खाते-पीते और प्रतिष्ठित परिवारों में गिना जाता था। दोनों भाइयों में गहरा प्रेम था, एक-दूसरे पर जान छिड़कते थे। लेकिन उनकी पत्नियों की दुश्मनी उनके भ्रातृ-प्रेम पर भारी पड़ गई। घर में रोज-रोज की किच-किच और कलह ने ऐसा विकराल रूप लिया कि शादी के पाँच साल बाद ही उनके वृद्ध माता-पिता ने तंग आकर घर, खेत-खलिहान, सब कुछ दोनों भाइयों के बीच बाँट दिया। एक आँगन के बीच में नफरत की एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई थी।

तब तक दया एक पुत्र, भरत, की माँ बन चुकी थी और कीर्ति के आँगन में भी दो बच्चे, गगन और श्रुति, किलकारियाँ भरने लगे थे।

भंवर सिंह ऊँचे पद पर थे, इसलिए उनके घर में लक्ष्मी की कृपा बरसने लगी। परिश्रम से कमाया हुआ धन अपने साथ यश और सम्मान भी लाता है। जल्द ही भंवर सिंह का नाम न केवल अपने गाँव बल्कि आस-पास के दर्जनों गाँवों में बड़े सम्मान से लिया जाने लगा। उन्हें अपनी मिट्टी और खेती-किसानी से अद्भुत लगाव था, इसलिए वे शहर में बसने के बजाय प्रतिदिन गाँव से ही अपने कार्यालय जाते और शाम को लौट आते। उनके माता-पिता भी उन्हीं के पास रहते थे, जिससे उनकी खेती की देखभाल और बेहतर होने लगी। खेतों में फसलें सोने की तरह लहलहाती थीं। पैतृक संपत्ति के रूप में मिले 40 बीघा खेत में अगले पंद्रह वर्षों में उन्होंने 60 बीघा और जोड़ दिया। अब वे सौ बीघा जमीन के मालिक, गाँव के सबसे बड़े और धनी किसान थे।

दूसरी ओर, उनका छोटा भाई मदन सिंह केवल कृषि पर निर्भर था। कड़ी मेहनत के बावजूद वह धन-संपत्ति के मामले में बड़े भाई से बहुत पिछड़ गया। दोनों भाइयों की आर्थिक स्थिति में एक गहरी खाई बन गई, और इस खाई के साथ ही दोनों बहनों, दया और कीर्ति, की घृणा और दुश्मनी की जड़ें और भी गहरी होती गईं। धीरे-धीरे दोनों परिवारों का आपस में सामान्य व्यवहार और बोलचाल भी पूरी तरह बंद हो गया।

भंवर सिंह ने पैतृक घर के अपने हिस्से में आस-पास की कुछ और भूमि मिलाकर एक भव्य हवेली का निर्माण करवाया। घर के मुख्य द्वार के पास एक विशाल बैठक बनवाई, जिसके आगे एक खुला बरामदा और उसके आगे एक चौड़ा चबूतरा था। यह स्थान इतना बड़ा था कि सौ लोग भी आराम से बैठ जाएँ तो भी जगह खाली रहे। सायंकाल जब भंवर सिंह अपनी ड्यूटी से लौटते, तब तक उनकी बैठक सज चुकी होती। नौकर-चाकर दो बड़ी चारपाइयाँ और पच्चीसों मूढ़े चबूतरे पर बिछा देते और दो हुक्के सुलगाकर तैयार रखते। गाँव के बड़े-बूढ़े और युवा वहाँ बैठकर हुक्के के मीठे धुएँ के साथ देश-दुनिया की चर्चा करते। भंवर सिंह के आते ही माहौल गंभीर हो जाता। गाँव के छोटे-मोटे विवादों से लेकर बड़े मामलों तक का हल उनकी एक बात पर चुटकियों में हो जाता था। उनकी जुबान पत्थर की लकीर थी। गाँव में उनके छोटे भाई मदन सिंह के परिवार को छोड़कर कोई ऐसा नहीं था, जो उनकी बात का सम्मान न करे। एक तरह से उनका गाँव कोर्ट-कचहरी और पुलिस-थाने के चक्करों से बचा हुआ था। यह बैठक "भंवर सिंह की चौपाल" के नाम से प्रसिद्ध हो गई।

पर समय सदैव एक-सा नहीं रहता। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। कुछ वर्षों बाद भंवर सिंह के माता-पिता स्वर्ग सिधार गए। उनकी कमी तो खली, पर भंवर सिंह की उन्नति और चौपाल की रौनक दिनों-दिन बढ़ती ही गई। कृषि की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी उन्होंने अपने कुशल नौकरों की सहायता से बखूबी संभाल ली।

समय का चक्र घूमता रहा। भंवर सिंह नौकरी से सेवानिवृत्त हो गए। अब तो "भंवर सिंह की चौपाल" और भी अधिक समय तक गुलजार रहने लगी। उनका एकमात्र बेटा भरत, जो अब पच्चीस वर्ष का हो चुका था, राजधानी के एक प्रसिद्ध कॉलेज से कानून की पढ़ाई पूरी करके स्नातकोत्तर कर रहा था।

किन्तु नियति ने एक ऐसी करवट ली, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। एक दिन भंवर सिंह और उनकी पत्नी दया पास के नगर से खरीदारी करके मोटरसाइकिल पर वापस लौट रहे थे। तभी एक तेज रफ्तार ट्रक मौत बनकर उन पर झपटा और दोनों पति-पत्नी को अपने विकराल पहियों तले लील गया।

यह खबर गाँव में बिजली की तरह फैली। भंवर सिंह और दया की मौत से सारा गाँव हतप्रभ और स्तब्ध रह गया। चौपाल का संरक्षक, गाँव का न्यायकर्ता, एक झटके में काल का ग्रास बन गया था। आनन-फानन में उनके पुत्र भरत को सूचना दी गई। वह बदहवास हालत में कॉलेज से पहुँचा। पूरा गाँव रो रहा था, मानो हर घर का कोई अपना चला गया हो। भरत ने किसी तरह खुद को सँभाला और काँपते हाथों से अपने माता-पिता को मुखाग्नि दी। तेरहवीं तक के सारे संस्कार गाँव वालों के सहयोग से संपन्न हुए।

इस दुःख की घड़ी में पूरा गाँव एक परिवार की तरह खड़ा था, सिवाय एक परिवार के—भंवर सिंह के सगे भाई और भरत के चाचा, मदन सिंह का परिवार। उनका दरवाजा इस दौरान बंद ही रहा। यह उनकी पुरानी शत्रुता थी या लोक-लाज का भय, यह कहना कठिन था। लेकिन उनके इस अमानवीय आचरण की पूरे गाँव में तीव्र आलोचना हो रही थी। लोग पीठ पीछे मदन सिंह और कीर्ति के नाम पर थूक रहे थे।

भरत, अपने माता-पिता की एकमात्र संतान। उसका पालन-पोषण किसी राजकुमार की तरह हुआ था। मुँह से बात निकलने से पहले हर इच्छा पूरी हो जाती थी। शहर में रहकर मिली आजादी और बेहिसाब पैसे ने उसकी आदतें बिगाड़ दी थीं। शराब, सिगरेट और देर रात की पार्टियाँ उसके शौक बन चुके थे। संगत भी वैसी ही मिली, और कॉलेज में उसकी गिनती बिगड़ैल और दबंग छात्रों में होने लगी। ईश्वर ने उसे लंबा-चौड़ा कद, हृष्ट-पुष्ट शरीर और आकर्षक व्यक्तित्व तो दिया था, लेकिन उसके खून में अपने पिता के संस्कार भी थे, जो उसे पूरी तरह से बुरा बनने से रोके हुए थे।

माता-पिता के आकस्मिक निधन का समाचार उसके सिर पर पहाड़ टूटने जैसा था। वह उस विशाल हवेली में तेरहवीं के बाद एकदम अकेला रह गया था। आज उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसके माता-पिता उसके लिए क्या थे। वह इस भरे-पूरे गाँव और विस्तृत संसार में स्वयं को नितांत अकेला, असहाय और निर्बल पा रहा था। उस रात वह अपने कमरे में बच्चों की तरह बिलख-बिलख कर रोता रहा। आज न तो उसे अपने आँचल में छिपाकर चुप कराने वाली माँ थी, और न ही सिर पर स्नेह से हाथ फेरकर संसार से लड़ने का हौसला देने वाला पिता।

अब उसके सामने एक यक्ष-प्रश्न था—वह अपनी अधूरी शिक्षा पूरी करने के लिए वापस शहर लौट जाए या गाँव में रहकर अपने विशाल खेत-खलिहानों की देखभाल करे? कुछ दिन की उधेड़बुन के बाद उसने अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़कर गाँव में ही रहने का निश्चय किया।

समय सबसे बड़ा मरहम है; वह हर घाव को भर देता है। भरत की पीड़ा भी धीरे-धीरे कम होने लगी, और वह अपने असली रंग में आने लगा। शाम को अब भंवर सिंह की चौपाल पर हुक्के की गुड़गुड़ाहट का स्थान बीयर और शराब की बोतलों के टकराने की आवाजों ने ले लिया था। राजनीति, गाँव के विकास और आपसी सुलह की बातों की जगह अब भरत और उसके शराबी मित्रों की फूहड़ हँसी, गाली-गलौज और डीजे के कानफोड़ू संगीत ने ले ली थी। शाम पाँच बजे यह महफिल सजती और देर रात एक-दो बजे तक चलती। आस-पड़ोस के घरों के दरवाजे शाम ढलते ही बंद हो जाते, पर दीवारों के पार आती गंदी गालियाँ और भद्दी फब्तियाँ सुनने को वे विवश थे। जिसने भी थोड़ा-बहुत विरोध करने का साहस किया, भरत की चांडाल-चौकड़ी ने उसे पीट-पीटकर चुप करा दिया। "भंवर सिंह की चौपाल" अब "बदमाशों का अड्डा" बन चुकी थी।

न जाने किसने और कब इस स्थान का नया नामकरण भी कर दिया, नया नाम दिया गया- “उल्लू का घरौंदा!” सारा गांव भंवर सिंह की चौपाल को उल्लु का घरौंदा कहने लगा और इस हवेली के मालिक भरत को उल्लु, क्योंकि उल्लू को विनाश का प्रतीक माना जाता है और भरत अपने पिता द्वारा कमाये गये सम्मान व दौलत का विनाश कर रहा था।  किसी बच्चे ने कोयले से हवेली की दीवार पर भी लिख दिया- “उल्लू का घरौंदा!”


भरत के घर से सटा हुआ मकान उसके चाचा मदन सिंह का था। वे भी यह सब मूक दर्शक बनकर देख-सुन रहे थे, पर उन्होंने कभी हस्तक्षेप नहीं किया। मदन सिंह की पत्नी कीर्ति तो अपनी बहन दया और बहनोई भंवर सिंह की मौत के बाद पूरी तरह बदल गई थी। उसने घर से बाहर निकलना लगभग बंद कर दिया था। वह घंटों गुमसुम बैठी रहती, जैसे किसी गहरे पश्चाताप में डूबी हो। मदन सिंह अपने भतीजे का यह पतन देखकर मन ही मन कुढ़ते और खिन्न होते। घर में कभी-कभी पत्नी के सामने भरत की हालत पर दुःख प्रकट करते, लेकिन फिर यह सोचकर स्वयं को ही कोसने लगते कि इस बर्बादी की नींव में कहीं न कहीं उनकी अपनी चुप्पी और उनकी पत्नी की जलाई हुई नफरत की आग भी शामिल थी। उन्हें लगता जैसे उनके भाई की आत्मा उनसे पूछ रही हो—"देखो मदन, यह मेरे सपनों का घर था और यह मेरे कलेजे का टुकड़ा! तुमने इसे बचाने के लिए क्या किया?"


प्रथम- शृंखला


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